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इमाम शरफुद्दीन मुहम्मद अल-बुसीरी (1211-1294 ई.)

 क़सीदा बुर्दा शरीफ इस्लामी साहित्य का एक प्रसिद्ध सूफी काव्य है। यह पैगंबर मुहम्मद (सल्ल.) की प्रशंसा में रचा गया है।

रचयिता
इमाम शरफुद्दीन मुहम्मद अल-बुसीरी (1211-1294 ई.) ने इसे लिखा। वे मिस्र के सूफी कवि थे और शादिली सिलसिले से जुड़े। काव्य रचना के दौरान उन्हें लकवा हुआ, लेकिन स्वप्न में पैगंबर ने चादर ओढ़ाकर ठीक किया।
सामग्री
यह 160 छंदों का अरबी क़सीदा है, जिसका पूरा नाम “अल-कवाकिबुद दुरीया फी मदीह खैरिल बरिया” है। इसमें पैगंबर का गुणगान, सहाबा की प्रशंसा और नैतिक शिक्षा है। सूफी इसे पढ़कर बरकत पाते हैं।
महत्व

इसकी 90 से अधिक टीकाएँ और उर्दू, हिंदी, फ़ारसी आदि में अनुवाद हैं। मस्जिदों में लिखा जाता है और मजालिस में पाठ होता है। अबू हनीफा से इसका सीधा संबंध नहीं, लेकिन हनफी-सूफी परंपरा में प्रिय। 

क़सीदा बुर्दा शरीफ को अदब व तमीज के साथ पढ़ने से आध्यात्मिक व दुनिया फायदे मिलते हैं। सूफी परंपरा में इसे बरकत का स्रोत माना जाता है।


Maulaya salli wasallim daaiman Abadan
Alaa habeebika khairil halqi qulle himi
Maulaya salli wasallim daaiman Abadan
Alaa habeebika khairil halqi qulle himi

مَوْلَایَ صَلِّ وَسَلِّمْ دَائِمًا اَبَدًا
عَلٰی حَبِیْبِکَ خَیْرِ الْخَلْقِ کُلِّھِم
مَوْلَایَ صَلِّ وَسَلِّمْ دَائِمًا اَبَدًا
عَلٰی حَبِیْبِکَ خَیْرِ الْخَلْقِ کُلِّھِم

Maulaya salli wasallim daaiman Abadan
Alaa habeebika khairil halqi qulle himi
Muhammadun sayyedul qaonaaine wassaqalaine
Walfareeqainee min urbin wa minn ajaami

مُحَمَّدٌ سَیِّدُ الْکَوْنَیْنِ وَالثَّقَلَیْنِ
وَالْفَرِیْقَیْنِ مِنْ عُرْبٍ وَّ وَمِنْ عَجَم
مَوْلَایَ صَلِّ وَسَلِّمْ دَائِمًا اَبَدًا
عَلٰی حَبِیْبِکَ خَیْرِ الْخَلْقِ کُلِّھِم

Wo Muhammad fakhr e alam Hadi e kul ins o jaan
Sarwar e qonain sultan e arab o ajam
Aik din Jibreel sy kehnay lagy shahe Umam
Tum nay dekha ha jahan, Batlao kaisay hain hum
Arz ki Jibreel nay, Ay shahe Deen ay Muhtaram
Ap ka koi mumasil hi nahin Rab ki qasam

وہ محمد فخرِ عالم ہادیِ کل انس و جاں
سرورِ قونین سلطانِ عرب شاہِ عجم
ایک دن جبرائیل سے کہنے لگے شاہِ امم
تم نے دیکھا ہے جہاں، بتلاو کیسے ہیں ہم
عرض کی جبرائیل نے، اے شاہِ دیں اے محترم
آپ کا کوئ مماثل ہی نہیں رب کی قسم

Maulaya salli wasallim daaiman Abadan
Alaa habeebika khairil halqi qulle himi
Huwalhabib allazi turja shafaa atuhu
Likulli haole minnal ahwal e muqtahimi

ھُوَ الْحَبِیْبُ الَّذِیْ تُرْجٰی شَفَاعَتُہ،
لِکُلِّ ھَوْلٍ مِّنَ الْاَھْوَالِ مُقْتَحِم
مَوْلَایَ صَلِّ وَسَلِّمْ دَائِمًا اَبَدًا
عَلٰی حَبِیْبِکَ خَیْرِ الْخَلْقِ کُلِّھِم

Maulaya salli wasallim daaiman Abadan
Alaa habeebika khairil halqi qulle himi
Yarabbi bilmustafa balighma qasida na
Waghfirlana mamada ya wasi alkarami

یَارَبِّ بِالْمُصْطَفٰی بَلِّغْ مَقَاصِدَنَا
وَاغْفِرْلَنَا مَامَضٰی یَا وَاسِعَ الْکَرَمِ
مَوْلَایَ صَلِّ وَسَلِّمْ دَائِمًا اَبَدًا
عَلٰی حَبِیْبِکَ خَیْرِ الْخَلْقِ کُلِّھِم


आध्यात्मिक फायदे

पैगंबर मुहम्मद (सल्ल.) पर सलात व सलाम का सवाब, दिल की नरमी और प्रेम में वृद्धि।

गुनाहों की माफी, रूहानी इलाज और जायज मुरादों की पूर्ति।

विशिष्ट खुवास (फायदे)

बीमारियों से शifa: रोज पढ़ने से प्लेग, चेचक, आंखों के रोग, पागलपन दूर।

आफतों से हिफाजत: घर में रोज 3 बार पढ़ें तो जिन्न, महामारी, दुर्घटना, अचानक मौत से सुरक्षा।

माली तंगी: 700 बार पढ़ें तो आर्थिक आसानी। कर्जदार 1000 बार पढ़ें तो निजात।

पढ़ने के तरीके

कुल पढ़ाई: 1000 बार उम्र में बरकत; 71 बार बला टालने को।

खास संख्या: 300 बार अकाल से बचाव; 116 बार औलाद के लिए। 7 शुक्रवार 70 बार माली मदद।

स्रोतों में ये खुवास बुजुर्गों की रिवायतें हैं, ईमान व अमल पर निर्भर।

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