Munajat - Ya Ilahi har jagah teri ata ka saath ho.
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| या इलाही हर जगह तेरी अता का साथ हो |
Munajat Ba Dargah Qaazi-yul-Haajaat
(मुनाजात व दरगाह काज़ियुल हाजात)यह मुबारक कलाम 'मुनाजात व दरगाह काज़ियुल हाजात' (जिसे आम तौर पर "या इलाही हर जगह तेरी अता का साथ हो" के नाम से जाना जाता है) अज़ीम रुहानी पेशवा इमाम-ए-अहले सुन्नत आला हज़रत इमाम अहमद रज़ा ख़ान फ़ाज़िले बरेलवी (रहिमहुल्लाह) की लिखी हुई एक मक़बूल-ए-बारगाह मुनाजात है।
इस मुनाजात में इंसान की पैदाइश से लेकर मौत, क़ब्र, महशर, पुलसिरात और आख़िरत के तमाम कठिन पड़ावों में अल्लाह ताला की रहमत और हुज़ूर अकरम ﷺ की शफ़ाअत की भीक माँगी गई है।
वज़ीफ़ा व फ़ज़ीलत (Rozana Padhne Ki Hidayaat)
रोज़ाना सुबह व शाम या हर नमाज़ के बाद इसको पढ़ लिया करे, बेहतर है।
इसके पढ़ने से तमाम जायज़ हाजात पूरी होती हैं, मुश्किलों में अल्लाह ताला की मदद हासिल होती है और ख़ात्मा ईमान पर होता है, इंशा अल्लाह।
क़ुरआन-ए-पाक की आयत
وَقَالَ رَبُّكُمُ ادْعُونِي أَسْتَجِبْ لَكُمْ
(सूरह ग़ाफ़िर/मोमिन, आयत: 60)
तर्जुमा: "और तुम्हारे रब ने फ़रमाया: मुझसे दुआ करो, मैं तुम्हारी दुआ क़बूल करूँगा।"
मुनाजात के अशआर व तर्जुमा (Full Lyrics with Meaning)
या इलाही हर जगह तेरी अ़ता का साथ हो।, जब पड़े मुश्किल शहे मुश्किल कुशा का साथ हो॥Ya Ilahi har jagah teri ata ka saath ho. Jab pade mushkil shahe mushkil kusha ka saath ho.
Mafhoom (Meaning):
ऐ अल्लाह! ज़िंदगी के हर मोड़ पर तेरी रहमत व अता हमारे साथ रहे, और जब भी कोई मुश्किल आ पड़े तो मुश्किल कुशा हुज़ूर अकदस ﷺ की शफ़ाअत और मदद हमारे शामिल-ए-हाल हो।
या इलाही भूल जाऊँ नज़अ़ की तकलीफ को। शादिये दीदार हुस्ने मुस्तफा का साथ हो॥
Ya Ilahi bhool jaaoon naz'a ki takleef ko. Shadiye deedaar husne mustafa ka saath ho.
Mafhoom (Meaning):
ऐ अल्लाह! मौत के वक़्त (नज़अ के आलम में) जो जांकनी की दाख़िली तकलीफ़ होती है, उसे मैं हुज़ूर मुस्तफ़ा ﷺ के हसीन व जमील चेहरे के दीदार की ख़ुशी में भूल जाऊँ।
या इलाही गोरे तीरह की जब आए सख्त रात। उनके प्यारे मुँह की सुब्बे जाँफिज़ा का साथ हो
Ya Ilahi gore teerah ki jab aaye sakht raat. Unke pyare muh ki subbe jaanfiza ka saath ho.
Mafhoom (Meaning):
ऐ अल्लाह! जब अंधेरी क़ब्र की भयानक और सख़्त रात आए, तो आक़ा ﷺ के मुबारक़ चेहरे की जान बख़्शने वाली नूराली सुबह का उजाला मेरे साथ हो।
या इलाही जब पड़े महशर में शोरे दारो गीर। अम्न देने वाले प्यारे पेशवा का साथ हो॥
Ya Ilahi jab pade mahshar mein shore daaro geer. Amn dene wale pyare peshwa ka saath ho.
Mafhoom (Meaning):
ऐ अल्लाह! जब क़यामत के मैदान में पकड़-पकड़ (पकड़-धाक और अज़ाब) का शोर बरपा हो, तब हमें अमन व सलामती देने वाले हमारे प्यारे पेशवा नबी-ए-कर्रीम ﷺ का साया नसीब हो।
या इलाही जब ज़बानें बाहर आएँ प्यास से। साहिबे कौसर शहे जूदो अ़ता का साथ हो॥
Ya Ilahi jab zabanen baahar aayen pyaas se. Sahibe kausar shahe joodo ata ka saath ho.
Mafhoom (Meaning):
ऐ अल्लाह! जब महशर की शिद्दत की प्यास से ज़बानें बाहर लटक रही हों, उस वक़्त हौज़-ए-कौसर के मालिक, सख़ावत व अता के बादशाह हुज़ूर ﷺ के मुबारक हाथों से सैराबी नसीब हो।
या इलाही सर्द मोहरी परहो जब खुरशीदे हश्र। सय्यदे बे साया के ज़िल्ले लिवा का साथ हो॥
Ya Ilahi sard mohri parho jab khursheede hashr. Sayyade be saaya ke zille liwa ka saath ho.
Mafhoom (Meaning):
ऐ अल्लाह! जब क़यामत का सूरज सवा नेज़े पर आकर बे-रुख़ी और आग बरसा रहा हो, तब बे-साया आक़ा ﷺ के झंडे (लिवा-उल-हम्द) का ठंडा साया हमें मयस्सर हो।
या इलाही गर मिये महशर से जब भड़कें बदन। दामने मूहबब की ठंडी हवा का साथ हो॥
Ya Ilahi gar miye mahshar se jab bhadken badan. Daamane muhabb ki thandi hawa ka saath ho.
Mafhoom (Meaning):
ऐ अल्लाह! जब महशर की तपन और गर्मी से जिस्म जलने लगें, उस वक़्त प्यारे महबूब ﷺ के दामन-ए-करम की ठंडी और राहत बख़्श हवा का साथ हो।
या इलाही नामए आमाल जब खुलने लगें। ऐब पोशे खल्क़ सत्तारे ख़ता का साथ हो॥
Ya Ilahi naamae aamaal jab khulne lagen. Aib poshe khalq sattaare khata ka saath ho.
Mafhoom (Meaning):
ऐ अल्लाह! जब नाम-ए-अमाल (अमालनामे) खोले जाएँ और गुनाह ज़ाहिर होने लगें, तब मख़लूक़ के ऐबों को छुपाने वाले और गुनाह बख़्शने वाले आक़ा ﷺ की पर्दापोशी हासिल हो।
या इलाही जब बहें आँखें हिसाबे जुर्म में। उन तबस्सुम रेज़ होंटोंकी दुआ का साथ हो॥
Ya Ilahi jab bahen aankhen hisaabe jurm mein. Un tabassum rez hontonski dua ka saath ho.
Mafhoom (Meaning):
ऐ अल्लाह! जब अपने गुनाहों के हिसाब के वक़्त ख़ौफ़ और शर्मिंदगी से आँखें बहने लगें, तब नबी-ए-पाक ﷺ के मुस्कुराते मुबारक़ होंठों से निकलने वाली शफ़ाअत की दुआ का साथ हो।
क़ुरआन-ए-पाक की आयत
وَلَسَوْفَ يُعْطِيكَ رَبُّكَ فَتَرْضَىٰ
(सूरह अदु-दुहा, आयत: 5)
तर्जुमा: "और अनक़रीब आपका रब आपको इतना देगा कि आप राज़ी हो जाएँगे।"
या इलाही जब हिसाबे खंदए बेजा रुलाऐ । चश्मे गिरयाने शफीए मुरतजा का साथ हो॥
Ya Ilahi jab hisaabe khandae beja rulay. Chashme giryaane shafeee murtaja ka saath ho.
Mafhoom (Meaning):
ऐ अल्लाह! जब दुनिया में की गई बेवजह की हंसी-मज़ाक़ का हिसाब हमें रुलाए, तब हमारी उम्मत के लिए रोने वाली शफ़ीअ मुस्तफ़ा ﷺ की मुक़द्दस आँखों की दुआओं का सहारा मिले।
या इलाही रंग लाएँ जब मेरी बे बाकियाँ। उनकी नीची नीची नज़रोंकी हया का साथ हो॥
Ya Ilahi rang laayen jab meri be baakiyan. Unki neechi neechi nazronki haya ka saath ho.
Mafhoom (Meaning):
ऐ अल्लाह! जब मेरी बेबाकियाँ और गुनाह पकड़ में आएँ, तब हुज़ूर ﷺ की हयादार और झुकी हुई पाक नज़रों की बरकत व शफ़ाअत हमारा बचाव करे।
या इलाही जब चलूँ बारीक राहे पुलसिरात। आफ़ताबे हाशमी नूरुल हुदा का साथ हो॥
Ya Ilahi jab chaloon tareek rahe pulsiraat. Aaftaabe hashmi noorul huda ka saath ho.
Mafhoom (Meaning):
ऐ अल्लाह! जब मैं पुलसिरात के अंधेरे और बारीक रास्ते पर चलूँ, तो हाशमी सूरज और हिदायत के नूर हुज़ूर मुस्तफ़ा ﷺ की रौशनी और रहनुमाई मेरे साथ हो।
या इलाही जब सरे शमशीर पर चलना पड़े। रब्बे सल्लिम कहने वाले ग़मज़ुदा का साथ हो॥
Ya Ilahi jab sare shamsheer par chalna pade. Rabbe sallim kehne wale gamzuda ka saath ho.
Mafhoom (Meaning):
ऐ अल्लाह! जब तलवार की धार से भी बारीक पुलसिरात से गुज़रना पड़े, तब उम्मत के ग़म में 'रब्बि सल्लिम' (ऐ अल्लाह! सलामत रख) की दुआ फ़रमाने वाले आक़ा ﷺ का साथ हो।
या इलाही जो दुआएँ नेक हम तुझ से करें। कुदसियों के लबसे आमीँ रब्बना का साथ हो॥
Ya Ilahi jo duaen nek ham tujh se karen. Kudsiyon ke labse aameen rabbana ka saath ho.
Mafhoom (Meaning):
ऐ अल्लाह! हम जो भी अच्छी और नेक दुआएँ तेरी बारगाह में करें, फ़रिश्तों (कु़द्सियों) के पाक लबों से उन दुआओं पर 'आमीन' का साथ हो ताकि वो तुरंत क़बूल हों।
या इलाही जब रज़ा ख़ाबे गिराँसे सर उठाए । दौलते बेदार इश्के मुस्तफा का साथ हो॥
Ya Ilahi jab raza khaabe giranse sar uthaay. Daulate beedaar ishke mustafa ka saath ho.
Mafhoom (Meaning):
ऐ अल्लाह! जब रज़ा (आला हज़रत) क़ब्र की गहरी नींद से अपना सर उठाए (क़यामत के दिन उठे), तो उसके पास हुज़ूर मुस्तफ़ा ﷺ के इश्क़ की सबसे बड़ी बेदार दौलत मौजूद हो।
मुनाजात व दरगाह काज़ियुल हाजात मोमिन के लिए एक बेहतरीन रूहानी सहारा और वज़ीफ़ा है। इसमें इमाम अहमद रज़ा ख़ान ने इंसान की आजिज़ी और आफ़ात-ओ-बलियात से निजात के लिए आक़ा-ए-दो जहाँ ﷺ की शफ़ाअत का उम्दा तरीक़े से तज़किरा किया है। इस दुआ को अपने रोज़ाना के रूटीन का हिस्सा बनाएँ ताकि दुनिया व आख़िरत दोनों में अल्लाह ताला की रहमत और रसूलुल्लाह ﷺ का करम नसीब हो।
Munajat Qaazi-ul-Haajat Hindi
मुनाजात व दरगाह काज़ियुल हाजात
- या इलाही हर जगह तेरी अता का साथ हो,
- जब पड़े मुश्किल शहे मुश्किल कुशा का साथ हो।।
- या इलाही भूल जाऊँ नज़अ की तकलीफ को,
- शादिये दीदार हुस्ने मुस्तफ़ा का साथ हो।।
- या इलाही गोरे तीरह की जब आए सख्त रात,
- उनके प्यारे मुँह की सुब्हे जाँफ़िज़ा का साथ हो।।
- या इलाही जब पड़े महशर में शोरे दारो गीर,
- अम्न देने वाले प्यारे पेशवा का साथ हो।।
- या इलाही जब ज़बानें बाहर आएँ प्यास से,
- साहिबे कौसर शहे जूदो अता का साथ हो।।
- या इलाही सर्द मोहरी परहो जब ख़ुरशीदे हश्र,
- सैय्यदे बे साया के ज़िल्ले लिवा का साथ हो।।
- या इलाही गर मिये महशर से जब भड़कें बदन,
- दामने मूहबब की ठंडी हवा का साथ हो।।
- या इलाही नामए आमाल जब खुलने लगें,
- ऐब पोशे ख़ल्क़ सत्तारे ख़ता का साथ हो।।
- या इलाही जब बहें आँखें हिसाबे जुर्म में,
- उन तबस्सुम रेज़ होंटों की दुआ का साथ हो।।
- या इलाही जब हिसाबे खंदए बेजा रुलाऐ ,
- चश्मे गिरयाने शफ़ीए मुर्तजा का साथ हो।।
- या इलाही रंग लाएँ जब मेरी बे बाकियाँ,
- उनकी नीची नीची नज़रों की हया का साथ हो।।
- या इलाही जब चलूँ तारीख़ राहे पुलसिरात,
- आफ़्ताबे हाशमी नूरुल हुदा का साथ हो।।
- या इलाही जब सरे शम्शीर पर चलना पड़े,
- रब्बे सल्लिम कहने वाले ग़मज़ुदा का साथ हो।।
- या इलाही जो दुआएँ नेक हम तुझ से करें,
- कुदसियों के लब से आमीं रब्बना का साथ हो।।
- या इलाही जब रज़ा ख़ाबे गिराँ से सर उठाए ,
- दौलते बेदार इश्क़े मुस्तफ़ा का साथ हो।।
Munajat Qaazi-ul-Haajat Hinglish
Munajat Qaazi-ul-Haajaat
- Ya Ilahi har jagah teri ata ka saath ho
- Jab pade mushkil shahe mushkil kusha ka saath ho
- Ya Ilahi bhool jaaun naza'a ki takleef ko
- Shadiye deedaar husne mustafa ka saath ho
- Ya Ilahi gore teerah ki jab aaye sakht raat
- Unke pyaare munh ki subhe jaanfiza ka saath ho
- Ya Ilahi jab pade mahshar mein shore daaro geer
- Amn dene waale pyaare peshwa ka saath ho
- Ya Ilahi jab zabaanein bahar aayein pyaas se
- Sahibe kausar shahe joodo ata ka saath ho
- Ya Ilahi sard mohri par ho jab khursheede hashr
- Sayyade be saaya ke zille liwa ka saath ho
- Ya Ilahi garmiye mahshar se jab bhadkein badan
- Daamne muhabbat ki thandi hawa ka saath ho
- Ya Ilahi naama-e-aamaal jab khulne lagein
- Aib poshe khalq sattaare khata ka saath ho
- Ya Ilahi jab bahein aankhein hisaabe jurm mein
- Un tabassum rez honton ki dua ka saath ho
- Ya Ilahi jab hisaabe khandaye beja rulaye
- Chashme giryaane shafee-e-murtaza ka saath ho
- Ya Ilahi rang laayein jab meri be-baakiyaan
- Unki neechi neechi nazron ki haya ka saath ho
- Ya Ilahi jab chaloon tareek rahe pularasirat
- Aaftaabe hashmi noorul huda ka saath ho
- Ya Ilahi jab sare shamsheer par chalna pade
- Rabbe sallim kehne waale ghamzuda ka saath ho
- Ya Ilahi jo duaayein nek hum tujh se karein
- Qudsiyon ke lab se aameen rabbana ka saath ho
- Ya Ilahi jab raza khaabe giraan se sar uthay
- Daulate bedaar ishq-e-mustafa ka saath ho.

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