सुबह तइबा में हुई बटता है बाड़ा नूर का || नात शरीफ || हिंदी में
यह बेहद खूबसूरत और मशहूर नात (क़सीदा) आला हज़रत **इमाम अहमद रज़ा ख़ान फ़ाज़िल-ए-बरेलवी** द्वारा लिखी गई है, जिसे **"क़सीदा-ए-नूर"** (Qasida-e-Noor) कहा जाता है। इसमें पैगंबर हज़रत मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की नूरानी शान का बहुत ही उम्दा और आशिकाना अंदाज़ में ज़िक्र किया गया है।
सुबह तैयबा में हुई बटता है बाड़ा नूर का, सदक़ा लेने नूर का आया है तारा नूर का
बाग़-ए-तैयबा में सुहाना फूल फूला नूर का, मस्त बू हैं बुलबुलें पढ़ती हैं कलमा नूर का
बारहवीं के चांद का मुजरा है सज्दा नूर का, बारह बुर्जों से झुका इक इक सितारा नूर का
उनके क़स्र-ए-क़द्र से ख़ुल्द एक कमरा नूर का, सिदरा पायें बाग़ में नन्हा सा पौधा नूर का
अर्श भी फ़िरदौस भी उस शाह-ए-वाला नूर का, यह मुसम्मन बुर्ज वह मुश्कू-ए-आला नूर का
आई बिदअत छाई ज़ुल्मत रंग बदला नूर का, माह-ए-सुन्नत मेहर-ए-तल्अत ले ले बदला नूर का
तेरे ही माथे रहा है ऐ जान सेहरा नूर का, बख़्त जागा नूर का चमका सितारा नूर का
मैं गदा तू बादशाह भर दे पियाला नूर का, नूर दिन दूना तेरा दे डाल सदक़ा नूर का
तेरी ही जानिब है पांचों वक़्त सज्दा नूर का, रुख़ है क़िब्ला नूर का अबरू है काबा नूर का
पुश्त पर ढलता सर-ए-अनवर से शमला नूर का, देखें मूसा तूर से उतरा सहीफ़ा नूर का
ताज वाले देख कर तेरा इमामा नूर का, सर झुकाते हैं इलाही बोल बाला नूर का
बीनिये पुरनूर पर रख़्शां है बुक्का नूर का, है लिवा-उल-हम्द पर उड़ता फरेरा नूर का
मुसहफ़-ए-आरिज़ पे है ख़त्त-ए-शफ़ीआ नूर का, लो सियाह कारो मुबारक हो क़बाला नूर का
आब-ए-ज़र बनता है आरिज़ पर पसीना नूर का, मुसहफ़-ए-एजाज़ पर चढ़ता है सोना नूर का
पेच करता है फ़िदा होने को लम्आ नूर का, गिर्द-ए-सर फिरने को बनता है इमामा नूर का
हैबत-ए-आरिज़ से थर्राता है शोला नूर का, कश्फ़-ए-पा पर गिर के बन जाता है गुफ़्फ़ा नूर का
शमअ दिल मिश्कात तन सीना ज़ुजाजा नूर का, तेरी सूरत के लिए आया है सूरह नूर का
मैल से किस दर्जे सुथरा है वह पुतला नूर का, है गले में आज तक कोरा ही कुर्ता नूर का
तेरे आगे ख़ाक पर झुकता है माथा नूर का, नूर ने पाया तेरे सज्दे से सीमा नूर का
तू है साया नूर का हर उज़्व टुकड़ा नूर का, साये का साया न होता है न साया नूर का
क्या बना नाम-ए-ख़ुदा असरा का दूल्हा नूर का, सर पे सेहरा नूर का बर में शहाना नूर का
बज़्म-ए-वहदत में मज़ा होगा दोबारा नूर का, मिलने शमअ-ए-तूर से जाता है इक्का नूर का
वस्फ़-ए-रुख़ में गाती हैं हूरें तराना नूर का, क़ुदरती बीनों में क्या बजता है लहरा नूर का
यह किताब-ए-कुन में आया तुर्फ़ा आया नूर का, ग़ैर-ए-क़ाइल कुछ न समझा कोई माना नूर का
देखने वालों ने कुछ देखा न भाला नूर का, मन् रआनी कैसा यह आईना दिखाया नूर का
सुबह कर दी कुफ़्र की सच्चा था मुज़्दा नूर का, शाम ही से था शब-ए-तीरह को धड़का नूर का
पड़ती है नूरी भरन उमडा है दरिया नूर का, सर झुका किश्त-ए-कुफ़्र आता है नूर का
नारियों का दौर था दिल जल रहा था नूर का, तुझ को देखा हो गया ठंडा कलेजा नूर का
नस्ख़-ए-अद्यां कर के ख़ुद क़ब्ज़ा बिठाया नूर का, ताजवर ने कर लिया कच्चा इलाक़ा नूर का
जो गदा देखो लिये जाता है तोड़ा नूर का, नूर की सरकार है क्या इस में तोड़ा नूर का
भीक ले सरकार से ला जल्द कासा नूर का, माह-ए-नौ तइबा में बटता है महीना नूर का
देख इन के होते नाज़ेबा है दावा नूर का, मेहर लिख दे यां के ज़र्रों को मुचल्का नूर का
यां भी दाग़-ए-सज्दा-ए-तइबा है तमग़ा नूर का, ऐ क़मर क्या तेरे ही माथे है टीका नूर का
शमअ सा एक एक परवाना है उस बा नूर का, नूर-ए-हक़ से लौ लगाये दिल में रिश्ता नूर का
अंजुमन वाले हैं अंजुम बज़्म हलक़ा नूर का, चांद पर तारों के झुरमुट से है हाला नूर का
तेरी नस्ल-ए-पाक में है बच्चा बच्चा नूर का, तू है ऐन-ए-नूर तेरा सब घराना नूर का
नूर की सरकार से पाया दो-शाला नूर का, हो मुबारक तुम को ज़ुन्नूरैन जोड़ा नूर का
किस के पर्दे ने किया आईना अंधा नूर का, मांगता फिरता है आंखें हर नगीना नूर का
अब कहां वह ताबिशें कैसा वह तड़का नूर का, मेहर ने छुप कर किया ख़ासा धुंधल्का नूर का
तुम मुक़ाबिल थे तो पहरों चांद बढ़ता नूर का, तुम से छुट कर मुंह निकल आया ज़रा सा नूर का
क़ब्र-ए-अनवर कहिए या क़स्र-ए-मुअल्ला नूर का, चर्ख़-ए-अतलस या कोई सादा सा क़ुब्बा नूर का
आँख मिल सकती नहीं दर पर है पहरा नूर का, ताब है बे-हुक्म पर मारे परिंदा नूर का
नज़अ में लौटेगा ख़ाक-ए-दर पे शैदा नूर का, मर के ओढ़ेगी अरूस-ए-जां दुपट्टा नूर का
ताब-ए-मेहर-ए-हश्र से चौंके न कुश्ता नूर का, बूंदियां रहमत की देने आईं छींटा नूर का
वज़अ-ए-वाज़े में तेरी सूरत है माना नूर का, यूं मजाज़न चाहें जिस को कह दे कलिमा नूर का
अम्बिया अज्ज़ा हैं तू बिल्कुल है जुमला नूर का, इस इलाक़े से है उन पर नाम सच्चा नूर का
यह जो मेहर-ओ-माह पे है इतलाक़ आता नूर का, भीक तेरे नाम की है इस्तिआरा नूर का
सुरमगीं आंखें हरीम-ए-हक़ के वह मुश्क़ीं ग़ज़ाल, है फ़ज़ा-ए-ला-मकां तक जिन का रमना नूर का
ताब-ए-हुस्न-ए-गर्म से खिल जायेंगे दिल के कंवल, नौ बहारें लाएगा गर्मी का झलका नूर का
ज़र्रे मेहर-ए-क़ुद्स तक तेरे तवस्सुत से गए, हद्द-ए-औसत ने किया सुग़रा को कुबरा नूर का
सब्ज़ा-ए-गर्दूं झुका था बहर-ए-पा-बोस-ए-बुराक़, फिर न सीधा हो सका खाया वह कोड़ा नूर का
ताब-ए-सुम से चौंधिया कर चांद उन्हीं क़दमों फिरा, हंस की बिजली ने कहा देखा चलावा नूर का
दीद-ए-नक़्श-ए-सुम को निकली सात पर्दों से निगाह, पुतलियां बोलीं चलो आया तमाशा नूर का
अक्स-ए-सुम ने चांद सूरज को लगाये चार चांद, पड़ गया सीम-ओ-ज़र-ए-गर्दूं पे सिक्का नूर का
चांद झुक जाता जिधर उंगली उठाते महद में, क्या ही चलता था इशारों पर खिलौना नूर का
एक सीने तक मुशाबेह इक वहां से पांव तक, हुस्न-ए-सिब्तैन इनके जामों में है नीमा नूर का
साफ़ शक्ल-ए-पाक है दोनों के मिलने से अयां, ख़त्त-ए-तौअम में लिखा है यह दो वरक़ा नूर का
काफ़ गेसू हा दहन या अबरू आँखें ऐन स्वाद, काफ़ हा या ऐन स्वाद उनका है चेहरा नूर का
ऐ रज़ा यह अहमद-ए-नूरी का फ़ैज़-ए-नूर है, हो गयी मेरी ग़ज़ल बढ़कर क़सीदा नूर का
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